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Friday, March 08, 2019

ख्वाहिशें

हल्की फुल्की सी है ज़िन्दगी
बोझ तो ख्वाहिशों का है।
ना जाने ये कैसा जाल
मन की साज़िशों का है।

सोचते थे... ख्वाहिशें ना हों, तो खुद से ऊब जाएंगे।
कहाँ पता था, ख्वाहिशों के समुंदर में खुद ही डूब जाएंगे।

सोचते थे... वो भी क्या दिन होगा, जब अपने बंगले की छत से उगता सूरज देख पाएँगे।
कहाँ पता था इस चाह में हम सूरज देखना ही भूल जाएँगे।

सपने पूरे करने चले थे... सपने देखना ही भूल गए।
ख्वाहिशों के बंधन में कुछ यूँ फंसे, ज़िन्दगी जीना ही भूल गए।

आज आया है होश फिर एक बार... इसे यूँ ही नहीं गंवाएँगे।
ख्वाब अभी भी सजाएँगे मगर, ये छोटी छोटी खुशियाँ नहीं भूल जाएँगे।

ज़िन्दगी के इस तराज़ू में... तौल कर कदम बढ़ाएँगे।
आगे तो बढ़ेंगे ही मगर, ज़रा थम कर इस पल का भी लुत्फ उठाएँगे।

हल्की फुल्की सी है ज़िन्दगी।
हंसी खुशी ही बिताएँगे।।

Friday, January 22, 2016

उड़ान

सुबह हुई ही है, सूरज उग रहा है।
यहां अलार्म की बीप से सारा घर गूँज रहा है।
अब दिनभर वही रोज़मर्रा की भाग-दौड़।
वही जद्दोजेहद। वही घर की बाग़-डोर।

बहुत चल लिए ज़िन्दगी में,
कुछ और करने को जी चाहता है।
सब छोड़ कर बस,
उड़ने को जी चाहता है।


शर्माजी का मकान।
पास की दुकान के पकवान।
सब चीज़ों की चाह तले,
ये तन घिसा चला जा रहा है।
इन आशाओं के बोझ तले,
ये दिल पिसा चला जा रहा है।

दौड़ भाग बहुत हो गई।
अब बस रुकने को जी चाहता है।
आशाओं के बंधन से मुक्त अब,
उड़ने को जी चाहता है।


जाति-धर्म के झगड़ों में,
बेक़सूर सूली चढ़ रहा है।
कुछ-एक की लालच और ताकत के नीचे दबकर,
कमज़ोर जान गँवा रहा है।

बहुत बन्ध लिए इन जाति-धर्म की ज़ंजीरों में।
इन्हें तोड़ कर खुल जाने को जी चाहता है।
सब भेदभाव हटा, फिर से एक होने को जी चाहता है।
ये सब बेमतलब के बोझ हलके कर अब बस...
उड़ने को जी चाहता है।
उड़ने को जी चाहता है।